नई दिल्ली रेडक्रॉस ब्लड सेंटर में रक्तदान के साथ-साथ जागरूकता के लिए पाॅजिटिव मीडिया ने संकल्प लिया व न्यूज लेटर सितंबर का हुआ लोकार्पण

नई दिल्ली रेडक्रॉस ब्लड सेंटर में रक्तदान के साथ-साथ जागरूकता के लिए पाॅजिटिव मीडिया ने संकल्प लिया व न्यूज लेटर का हुआ लोकार्पण 


रेड क्रॉस ने तय किया 95 प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान का लक्ष्य और  5,500 ब्लड बैंकों की निगरानी तेज - डा. वनश्री सिंह 


रक्त की मांग में निरंतर वृद्धि के मद्देनजर पाॅजिटिव मीडिया परिवार की तरह और संस्थाओं को नियमित रक्तदान अभियान से जुड़ना होगा - डा.किरण चौधरी 


नई दिल्ली — राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस 1 अक्टूबर की पूर्व संध्या पर भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी मुख्यालय, दिल्ली की संयुक्त सचिव व इंचार्ज ब्ल्ड बैंक डा.वंश्री सिंह ने कहा कि अगले वर्ष तक देश में स्वैच्छिक रक्तदान का अनुपात 95 प्रतिशत तक पहुंचाने का राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया है। इसके साथ ही संस्था ने देश भर के 5,500 लाइसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों में जांच मानकों और रक्त के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व्यवस्था को कड़ा कर दिया है।

कार्यक्रम का संयोजन आरजेएस पीबीएच -आरजेएस पाॅजिटिव के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना द्वारा रेडक्रॉस के सहयोग से 30 सितंबर 2026 को किया गया था । सकारात्मक आंदोलन की सह-संस्थापक श्रीमती बिन्दा मन्ना ने मंचासीन अतिथियों का वंदे मातरम् का पटना ओढ़ाकर स्वागत किया।इस अवसर पर आरजेएस की मासिक पत्रिका पाॅजिटिव मीडिया का मानद संपादक उदय शंकर सिंह कुशवाहा ने लोकार्पण कराया । उन्होंने कहा कि सनसनीखेज और नकारात्मक पत्रकारिता के स्थान पर तथ्यपरक और जनसरोकारी सूचनाओं के प्रसार पर बल दिया गया। और आरजेएस मीडिया इंचार्ज प्रखर वार्ष्णेय ( डीडीएन स्टूडियो )ने धन्यवाद ज्ञापित किया। अक्षित मौर्य और विवेक कुमार सिंह दोनों रक्तदाताओं  को लोगों ने सराहा।



कार्यक्रम में पाॅजिटिव मीडिया परिवार के पांच लोग स्वैच्छिक रक्तदान के लिए आगे आए। अक्षित मौर्य और विवेक कुमार सिंह ने रक्तदान किया वहीं बाकी लोग‌ स्वास्थ्य जांच में पास नहीं हुए। पाॅजिटिव मीडिया परिवार के लगभग पैंतीस लोगों ने रक्तदान जागरूकता का त्रैमासिक संकल्प लिया। संकल्प लेनेवालों में -हिमांशु सांगर,प्रखर वार्ष्णेय,सुशील जी,प्रशांत यादव,खुशबू झा,राहुल प्रकाश,निशांत यादव,अज़मिल ,मो. शाकिर फारूकी और विकास थापा आदि शामिल थे। इसके अलावा स्वीटी पाॅल,प्रीति अरोड़ा, अशोक कुमार मलिक, मनोज मनु, सुनील कुमार सिंह आदि मौजूद रहे।कार्यक्रम की मुख्य वक्ता डॉ. वंश्री सिंह ने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर अप्रैल माह से रेड क्रॉस को एक महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है। 



डॉ. सिंह ने कहा कि देश भर में रेड क्रॉस स्वयं 116 ब्लड बैंक संचालित करता है और सरकार के सहयोगी के रूप में कार्य करता है। जिन जिलों में रेड क्रॉस के अपने ब्लड बैंक नहीं हैं, वहां संस्था शिविर आयोजकों और सरकारी अस्पतालों के बीच समन्वय स्थापित करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश को रिप्लेसमेंट डोनेशन यानी मरीज के परिजनों से आपात स्थिति में रक्त मांगने की विवशता से बाहर निकलकर विकसित देशों की तरह पूर्णतः स्वैच्छिक रक्तदान प्रणाली की ओर बढ़ना होगा। उन्होंने रेड क्रॉस द्वारा संचालित निःशुल्क थैलेसीमिया स्क्रीनिंग शिविरों का उल्लेख करते हुए बताया कि यदि दो थैलेसीमिया वाहक विवाह करते हैं, तो बच्चे में गंभीर थैलेसीमिया होने की 25 प्रतिशत आशंका रहती है, जिसके उपचार के लिए आजीवन रक्त चढ़ाने अथवा बोन मैरो ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है।


कार्यक्रम की मुख्य अतिथि तथा डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. किरण चौधरी ने कहा कि भारत ने बीते वर्ष लगभग 14 मिलियन यूनिट रक्त एकत्र कर अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया, लेकिन बदलती जनसांख्यिकी नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। देश में बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं, जिससे रक्त की मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए युवाओं का नियमित रक्तदान अभियान से जुड़ना अनिवार्य है।

रक्तदान से जुड़ी भ्रांतियों का निवारण करते हुए डॉ. चौधरी ने कहा कि सामान्य वयस्क शरीर में पांच से सात लीटर रक्त होता है, जिसमें से दान के समय वजन के आधार पर केवल 350 से 450 मिलीलीटर रक्त लिया जाता है। यह मात्रा कुछ ही समय में पुनः बन जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में पूरी तरह विसंक्रमित और सिंगल-यूज सुइयों का उपयोग होता है, जिन्हें प्रयोग के तुरंत बाद नष्ट कर दिया जाता है, जिससे एचआईवी या अन्य कोई भी संक्रमण फैलने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

देश में महिला रक्तदाताओं की कम संख्या के विषय में पूछे जाने पर डॉ. चौधरी ने कहा कि महिलाएं रक्तदान से डरती नहीं हैं, बल्कि पोषण संबंधी असमानता और मासिक धर्म के कारण वे अक्सर एनीमिया का शिकार हो जाती हैं। निर्धारित मानक के अनुसार रक्तदान के लिए हीमोग्लोबिन 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर होना आवश्यक है। जांच में कम हीमोग्लोबिन पाए जाने पर रक्तदाता को केवल अस्थायी रूप से रोका जाता है, न कि हमेशा के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है।

नियमों के अनुसार 18 से 65 वर्ष की आयु के बीच रक्तदान किया जा सकता है। पुरुष प्रत्येक तीन माह और महिलाएं प्रत्येक चार माह के अंतराल पर रक्तदान कर सकती हैं। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति 60 वर्ष की आयु तक पहली बार भी रक्तदान नहीं कर पाया है, तो सुरक्षा कारणों से 60 वर्ष के बाद पहली बार उसका रक्त नहीं लिया जाता, जबकि नियमित रक्तदाता 65 वर्ष तक रक्तदान जारी रख सकते हैं। डॉ. चौधरी ने किसी भी प्रकार के वित्तीय अथवा भौतिक प्रलोभन देकर रक्तदान कराने का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि व्यावसायिक प्रोत्साहन से रक्त की शुद्धता और सुरक्षा प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि एकत्र किए गए प्रत्येक यूनिट की एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, सिफलिस और मलेरिया की गहन जांच होती है और कोई भी संदिग्ध या रिएक्टिव यूनिट तुरंत नष्ट कर दिया जाता है।


रक्तदान प्रणाली के इतिहास को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि एड्स के प्रसार से पूर्व और एच.डी. सूरी द्वारा दायर जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय से पहले देश में पैसे देकर या कैदियों से रक्त लेने की प्रथाएं मौजूद थीं। उस न्यायिक आदेश के बाद भारत के ब्लड बैंकिंग तंत्र का व्यापक आधुनिकीकरण हुआ और व्यावसायिक खरीद-फरोख्त पर पूर्ण प्रतिबंध लगा।


आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में 30 सितंबर से 31 दिसंबर तक चलने वाले तीन माह के विशेष राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान की शुरुआत की गई। राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने उपस्थित लोगों को जाति, धर्म, वर्ग और भाषा के भेदभाव से परे हटकर जरूरतमंदों के लिए नियमित और स्वैच्छिक रक्तदान करने तथा समाज को प्रेरित करने की सामूहिक शपथ दिलाई। 

कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ रक्तदाताओं ने अपने अनुभव साझा किए। तिहाड़ जेल के सामने पेट्रोल पंप संचालित करने वाले पवन दीवान ने बताया कि वे 1980 से अब तक 184 बार रक्तदान कर चुके हैं और विगत 15 वर्षों से नियमित शिविर भी आयोजित कर रहे हैं। 67 वर्षीय राहुल छोरापुरकर ने 177 बार रक्तदान का आंकड़ा साझा करते हुए बताया कि उन्होंने कोविड महामारी के गंभीर दौर में लगभग 350 लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया था। कारगिल युद्ध के समय से रक्तदान कर रहे प्रकृति सेवा फाउंडेशन के अध्यक्ष दिनेश कुमार कुशवाहा ने बताया कि हीमोग्लोबिन 11.6 रहने के कारण वे अपना 50वां रक्तदान बुधवार को पूरा नहीं कर सके, जो यह सिद्ध करता है कि पात्रता जांच रक्तदाता के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए कितनी सख्त है। विदेश मंत्रालय से सेवानिवृत्त निदेशक सुनील कुमार सिंह को भी आयु सीमा संबंधी तकनीकी नियमों के कारण रक्तदान से रोका गया।

संगोष्ठी में महानगरों में रक्त के अधिशेष और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी कमी के अंतर को पाटने के लिए ई-रक्त कोश जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को सुदृढ़ करने तथा अंतर-जिला परिवहन नेटवर्क विकसित करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की गई।

आकांक्षा

 हेड क्रिएटिव टीम 

आरजेएस पीबीएच 

9811705015.

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