राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस: विशेषज्ञों ने जैविक घड़ी, आंत के स्वास्थ्य और प्रमाण-आधारित आयुर्वेद पर दिया जोर
प्रो.(डा.) गौड़ ने फ्रिज में रखे बासी, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन के खतरों के प्रति आगाह किया।
नई दिल्ली
चिकित्सा शोधकर्ताओं और आयुर्वेद विशेषज्ञों ने आधुनिक जीवनशैली को पारंपरिक जैविक घड़ी और दिनचर्या के अनुरूप ढालने का आह्वान करते हुए कहा है कि समग्र स्वास्थ्य अनियंत्रित दवाओं पर नहीं, बल्कि चयापचय अनुशासन, मानसिक संतुलन और वैज्ञानिक प्रमाणों पर निर्भर करता है। आरजेएस पीबीएच -आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना द्वारा संचालित 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के उपलक्ष्य में 23 सितंबर 2026 को स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय वेबिनार में प्रमुख संस्थानों के चिकित्सकों ने बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवाएं लेने के खतरों से आगाह किया और पाचन तंत्र की विकृतियों से होने वाले गंभीर शारीरिक रोगों की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। कार्यक्रम में आरजेएस पीबीएच के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर और आरजेएस पाॅजिटिव ब्रांच नोएडा के मानद प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा भी शामिल हुए।
आयरलैंड,यूके से ऑनलाइन माध्यम से मुख्य वक्ता के रूप में विचार व्यक्त करते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के पूर्व संकाय सदस्य डॉ. यामिनी भूषण त्रिपाठी ने पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों को आधुनिक जीव विज्ञान की कसौटी पर प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में स्वास्थ्य को केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति बताया था, जबकि आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पूर्व इसमें आध्यात्मिक सुख और इंद्रियों की प्रसन्नता को भी समाहित किया था। दोष, अग्नि और धातु का संतुलन तथा आत्मा, इंद्रियों और मन की प्रसन्नता ही वास्तविक स्वास्थ्य है।
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को लगातार प्रमाणित कर रहे हैं। जीवनशैली की विसंगतियों को उन्होंने तीन कारकों के रूप में रेखांकित किया, जिसमें लगातार जल्दबाजी, मानसिक चिंता और अत्यधिक तला-भुना या जंक फूड शामिल हैं। उन्होंने बताया कि निरंतर तनाव और गरिष्ठ भोजन से कोशिकाओं का पावरहाउस कहे जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया अनियंत्रित होकर फ्री रेडिकल्स बनाते हैं, जिससे शरीर के भीतर हल्की लेकिन निरंतर सूजन की स्थिति पैदा होती है। इसके साथ ही अत्यधिक चिंता से मस्तिष्क से कैटेकोलामाइन का स्राव बढ़ जाता है, जो कम उम्र में दिल के दौरे और अन्य जानलेवा रोगों का प्रमुख कारण बनता है।
जैविक घड़ी के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि शरीर की आंतरिक प्रणालियां वात, पित्त और कफ के चार-चार घंटे के चक्र में कार्य करती हैं। रात 10 बजे से 2 बजे तक का समय पित्त का होता है, जब शरीर विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है। इस दौरान देर रात भोजन करने से शरीर का चयापचय चक्र टूट जाता है और यकृत पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए आचरण का संयम, कम से कम सात घंटे की गहरी नींद और दो भोजनों के बीच चार घंटे का अंतर बनाए रखने को अनिवार्य बताया।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान, दिल्ली सरकार के निदेशक-प्रिंसिपल प्रो. डॉ. एम.बी. गौड़ ने सरकारी और नीतिगत प्रयासों पर प्रकाश डाला। प्रो. गौड़ ने कहा कि केंद्रीय आयुष मंत्रालय आयुर्वेद को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों, अनुसंधान और नवाचार के साथ वैश्विक स्तर पर मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। आयुर्वेद का प्राथमिक उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोग होने पर उसका समूल निवारण करना है।
प्रो. गौड़ ने फ्रिज में रखे बासी, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन के खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि प्राचीन ग्रंथों में ऐसे आहार को दुख और शोक उत्पन्न करने वाला बताया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर शीर्ष चिकित्सा संस्थानों तक आयुर्वेद के व्यावहारिक और सरल सिद्धांतों को लागू करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है, ताकि जनसामान्य को सात्विक और संतुलित जीवनशैली से जोड़ा जा सके।
चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान के स्वस्थवृत्त एवं योग विभाग की एमडी शोधार्थी डॉ. गुंजन मेहरा ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय पोषण संस्थान और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि गैर-संचारी रोगों से होने वाली अधिकांश मौतों का मुख्य कारण बिगड़ती जीवनशैली है।
डॉ. मेहरा ने आहार विधि विशेष आयतन के नियम समझाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी खाद्य पदार्थ का प्रभाव उसकी प्रकृति, पकाने की विधि, मात्रा, देश, काल और खाने वाले की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने मूंग दाल का उदाहरण देते हुए बताया कि सामान्य रूप से पकाई गई मूंग दाल सुपाच्य होती है, लेकिन उसी दाल को हलवे या भारी रूप में लेने पर वह पचने में अत्यंत भारी हो जाती है, जबकि अंकुरित मूंग का पोषण अधिक होने के कारण उसे पचने में अधिक समय लगता है। उन्होंने खाली पेट ताजे फल खाने से बचने की सलाह दी, क्योंकि इससे रक्त में शर्करा का स्तर अचानक बढ़ सकता है। फल दिन के समय हल्के भोजन के बाद ही खाने चाहिए।
आयुर्वेदिक औषधियों को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए डॉ. मेहरा ने कहा कि यह सोचना गलत है कि देसी दवाओं के दुष्प्रभाव नहीं होते। यदि किसी औषधि का रोग पर प्रभाव होता है, तो अनुचित और बिना चिकित्सीय सलाह के प्रयोग से उसका प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकता है।
सत्र के दौरान आयोजित विस्तृत प्रश्नोत्तर काल में प्रतिभागियों ने कोविड उपरांत स्वास्थ्य, आंत-मस्तिष्क संबंध और व्यावहारिक समस्याओं पर सवाल रखे।
डॉ. रश्मि चौबे ने कोरोना संक्रमण के बाद शरीर में आई कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट के समाधान पर सवाल पूछा। इसके उत्तर में प्रो. गौड़ ने मौसमी और ताजा सात्विक आहार लेने तथा बासी भोजन से पूरी तरह बचने का निर्देश दिया। डॉ. त्रिपाठी ने जोड़ा कि संक्रमण के भय से सत्व गुण प्रभावित होता है, जिससे प्रतिरोधक क्षमता घटती है। उन्होंने आंवला और हल्दी का नियमित पूरक आहार के रूप में सेवन करने और डायाफ्रामिक श्वसन तथा कुंभक प्राणायाम के माध्यम से पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करने की सलाह दी, जिससे हृदय गति की परिवर्तनशीलता सुधरती है और तनाव घटता है।
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल सिंह ने आयुर्वेद में वर्णित मंदाग्नि को आधुनिक मनोरोग और पाचन विज्ञान से जोड़ने पर सवाल किया। डॉ. मेहरा ने बताया कि जब पाचक एंजाइम उचित मात्रा में स्रावित नहीं होते, तो बिना पचा भोजन आंतों में सड़कर आम यानी विषाक्त तत्व बनाता है, जो आगे चलकर कई बीमारियों की जड़ बनता है। डॉ. त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव सीधे तौर पर पाचन तंत्र के स्राव और कार्यप्रणाली को अवरुद्ध करता है। इसके निदान के लिए सौंठ, सेंधा नमक और नींबू का उपयोग पाचन अग्नि को प्रदीप्त करने में उपयोगी है, वहीं भोजन के बाद वज्रासन में बैठने और प्राणायाम करने से आंत और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है।
छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र के प्रतिभागी इसहाक खान ने ग्रामीण श्रमिकों की दिनचर्या का उल्लेख करते हुए कड़वी सब्जियों के प्रभाव पर सवाल पूछा। प्रो. गौड़ और डॉ. त्रिपाठी ने चेतावनी दी कि यदि लौकी या तोरी जैसी सामान्य सब्जियां पकने के बाद कड़वी लगें, तो वे विषाक्त हो चुकी होती हैं और उनमें कुकुर्बिटासिन विष उत्पन्न हो जाता है। ऐसी सब्जियों का सेवन अत्यंत घातक हो सकता है, इसलिए उन्हें तुरंत फेंक देना चाहिए।
प्रतिभागी आर.एस. कुशवाहा द्वारा 68 वर्ष की आयु में प्रोस्टेट समस्या और रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या पूछे जाने पर प्रो. गौड़ ने शाम के समय तरल पदार्थों का सेवन कम करने और नींद के चक्र को सुधारने का सुझाव दिया। डॉ. त्रिपाठी और डॉ. मेहरा ने कीगल व्यायाम, सेतुबंधासन, भद्रासन और गोमुखासन के अभ्यास के साथ-साथ वैध सलाह से गोखरू के प्रयोग की सलाह दी।
स्वीटी पॉल द्वारा दिनचर्या और आहार संतुलन पर रखे गए विचारों पर डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि कब्ज जैसी समस्याओं से निपटने के लिए पेट साफ करने की दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जठराग्नि को ठीक करना सबसे टिकाऊ समाधान है।
प्रो.(डा.) गौड़ ने फ्रिज में रखे बासी, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन के खतरों के प्रति आगाह किया।
नई दिल्ली
चिकित्सा शोधकर्ताओं और आयुर्वेद विशेषज्ञों ने आधुनिक जीवनशैली को पारंपरिक जैविक घड़ी और दिनचर्या के अनुरूप ढालने का आह्वान करते हुए कहा है कि समग्र स्वास्थ्य अनियंत्रित दवाओं पर नहीं, बल्कि चयापचय अनुशासन, मानसिक संतुलन और वैज्ञानिक प्रमाणों पर निर्भर करता है। आरजेएस पीबीएच -आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना द्वारा संचालित 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के उपलक्ष्य में 23 सितंबर 2026 को स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय वेबिनार में प्रमुख संस्थानों के चिकित्सकों ने बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवाएं लेने के खतरों से आगाह किया और पाचन तंत्र की विकृतियों से होने वाले गंभीर शारीरिक रोगों की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। कार्यक्रम में आरजेएस पीबीएच के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर और आरजेएस पाॅजिटिव ब्रांच नोएडा के मानद प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा भी शामिल हुए।
आयरलैंड,यूके से ऑनलाइन माध्यम से मुख्य वक्ता के रूप में विचार व्यक्त करते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के पूर्व संकाय सदस्य डॉ. यामिनी भूषण त्रिपाठी ने पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों को आधुनिक जीव विज्ञान की कसौटी पर प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में स्वास्थ्य को केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति बताया था, जबकि आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पूर्व इसमें आध्यात्मिक सुख और इंद्रियों की प्रसन्नता को भी समाहित किया था। दोष, अग्नि और धातु का संतुलन तथा आत्मा, इंद्रियों और मन की प्रसन्नता ही वास्तविक स्वास्थ्य है।
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को लगातार प्रमाणित कर रहे हैं। जीवनशैली की विसंगतियों को उन्होंने तीन कारकों के रूप में रेखांकित किया, जिसमें लगातार जल्दबाजी, मानसिक चिंता और अत्यधिक तला-भुना या जंक फूड शामिल हैं। उन्होंने बताया कि निरंतर तनाव और गरिष्ठ भोजन से कोशिकाओं का पावरहाउस कहे जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया अनियंत्रित होकर फ्री रेडिकल्स बनाते हैं, जिससे शरीर के भीतर हल्की लेकिन निरंतर सूजन की स्थिति पैदा होती है। इसके साथ ही अत्यधिक चिंता से मस्तिष्क से कैटेकोलामाइन का स्राव बढ़ जाता है, जो कम उम्र में दिल के दौरे और अन्य जानलेवा रोगों का प्रमुख कारण बनता है।
जैविक घड़ी के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि शरीर की आंतरिक प्रणालियां वात, पित्त और कफ के चार-चार घंटे के चक्र में कार्य करती हैं। रात 10 बजे से 2 बजे तक का समय पित्त का होता है, जब शरीर विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है। इस दौरान देर रात भोजन करने से शरीर का चयापचय चक्र टूट जाता है और यकृत पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए आचरण का संयम, कम से कम सात घंटे की गहरी नींद और दो भोजनों के बीच चार घंटे का अंतर बनाए रखने को अनिवार्य बताया।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान, दिल्ली सरकार के निदेशक-प्रिंसिपल प्रो. डॉ. एम.बी. गौड़ ने सरकारी और नीतिगत प्रयासों पर प्रकाश डाला। प्रो. गौड़ ने कहा कि केंद्रीय आयुष मंत्रालय आयुर्वेद को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों, अनुसंधान और नवाचार के साथ वैश्विक स्तर पर मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। आयुर्वेद का प्राथमिक उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोग होने पर उसका समूल निवारण करना है।
प्रो. गौड़ ने फ्रिज में रखे बासी, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन के खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि प्राचीन ग्रंथों में ऐसे आहार को दुख और शोक उत्पन्न करने वाला बताया गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर शीर्ष चिकित्सा संस्थानों तक आयुर्वेद के व्यावहारिक और सरल सिद्धांतों को लागू करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है, ताकि जनसामान्य को सात्विक और संतुलित जीवनशैली से जोड़ा जा सके।
चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान के स्वस्थवृत्त एवं योग विभाग की एमडी शोधार्थी डॉ. गुंजन मेहरा ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय पोषण संस्थान और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि गैर-संचारी रोगों से होने वाली अधिकांश मौतों का मुख्य कारण बिगड़ती जीवनशैली है।
डॉ. मेहरा ने आहार विधि विशेष आयतन के नियम समझाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी खाद्य पदार्थ का प्रभाव उसकी प्रकृति, पकाने की विधि, मात्रा, देश, काल और खाने वाले की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने मूंग दाल का उदाहरण देते हुए बताया कि सामान्य रूप से पकाई गई मूंग दाल सुपाच्य होती है, लेकिन उसी दाल को हलवे या भारी रूप में लेने पर वह पचने में अत्यंत भारी हो जाती है, जबकि अंकुरित मूंग का पोषण अधिक होने के कारण उसे पचने में अधिक समय लगता है। उन्होंने खाली पेट ताजे फल खाने से बचने की सलाह दी, क्योंकि इससे रक्त में शर्करा का स्तर अचानक बढ़ सकता है। फल दिन के समय हल्के भोजन के बाद ही खाने चाहिए।
आयुर्वेदिक औषधियों को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए डॉ. मेहरा ने कहा कि यह सोचना गलत है कि देसी दवाओं के दुष्प्रभाव नहीं होते। यदि किसी औषधि का रोग पर प्रभाव होता है, तो अनुचित और बिना चिकित्सीय सलाह के प्रयोग से उसका प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकता है।
सत्र के दौरान आयोजित विस्तृत प्रश्नोत्तर काल में प्रतिभागियों ने कोविड उपरांत स्वास्थ्य, आंत-मस्तिष्क संबंध और व्यावहारिक समस्याओं पर सवाल रखे।
डॉ. रश्मि चौबे ने कोरोना संक्रमण के बाद शरीर में आई कमजोरी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट के समाधान पर सवाल पूछा। इसके उत्तर में प्रो. गौड़ ने मौसमी और ताजा सात्विक आहार लेने तथा बासी भोजन से पूरी तरह बचने का निर्देश दिया। डॉ. त्रिपाठी ने जोड़ा कि संक्रमण के भय से सत्व गुण प्रभावित होता है, जिससे प्रतिरोधक क्षमता घटती है। उन्होंने आंवला और हल्दी का नियमित पूरक आहार के रूप में सेवन करने और डायाफ्रामिक श्वसन तथा कुंभक प्राणायाम के माध्यम से पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करने की सलाह दी, जिससे हृदय गति की परिवर्तनशीलता सुधरती है और तनाव घटता है।
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल सिंह ने आयुर्वेद में वर्णित मंदाग्नि को आधुनिक मनोरोग और पाचन विज्ञान से जोड़ने पर सवाल किया। डॉ. मेहरा ने बताया कि जब पाचक एंजाइम उचित मात्रा में स्रावित नहीं होते, तो बिना पचा भोजन आंतों में सड़कर आम यानी विषाक्त तत्व बनाता है, जो आगे चलकर कई बीमारियों की जड़ बनता है। डॉ. त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव सीधे तौर पर पाचन तंत्र के स्राव और कार्यप्रणाली को अवरुद्ध करता है। इसके निदान के लिए सौंठ, सेंधा नमक और नींबू का उपयोग पाचन अग्नि को प्रदीप्त करने में उपयोगी है, वहीं भोजन के बाद वज्रासन में बैठने और प्राणायाम करने से आंत और मस्तिष्क का तालमेल बेहतर होता है।
छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र के प्रतिभागी इसहाक खान ने ग्रामीण श्रमिकों की दिनचर्या का उल्लेख करते हुए कड़वी सब्जियों के प्रभाव पर सवाल पूछा। प्रो. गौड़ और डॉ. त्रिपाठी ने चेतावनी दी कि यदि लौकी या तोरी जैसी सामान्य सब्जियां पकने के बाद कड़वी लगें, तो वे विषाक्त हो चुकी होती हैं और उनमें कुकुर्बिटासिन विष उत्पन्न हो जाता है। ऐसी सब्जियों का सेवन अत्यंत घातक हो सकता है, इसलिए उन्हें तुरंत फेंक देना चाहिए।
प्रतिभागी आर.एस. कुशवाहा द्वारा 68 वर्ष की आयु में प्रोस्टेट समस्या और रात में बार-बार पेशाब आने की समस्या पूछे जाने पर प्रो. गौड़ ने शाम के समय तरल पदार्थों का सेवन कम करने और नींद के चक्र को सुधारने का सुझाव दिया। डॉ. त्रिपाठी और डॉ. मेहरा ने कीगल व्यायाम, सेतुबंधासन, भद्रासन और गोमुखासन के अभ्यास के साथ-साथ वैध सलाह से गोखरू के प्रयोग की सलाह दी।
स्वीटी पॉल द्वारा दिनचर्या और आहार संतुलन पर रखे गए विचारों पर डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि कब्ज जैसी समस्याओं से निपटने के लिए पेट साफ करने की दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जठराग्नि को ठीक करना सबसे टिकाऊ समाधान है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में अतिथियों के अलावा प्रतिभागियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। इनमें शामिल थे-दीप माथुर,उदय शंकर सिंह कुशवाहा, बिंदा मन्ना ,स्वीटी पॉल, राजेंद्र सिंह कुशवाहा, नीति अरोड़ा, डॉ रश्मि चौबे, डॉ राहुल सिंह ,विक्की शर्मा, शिवम ,नीरज जोशी ,डॉ उन्नीकृष्णन एस ,डा.बामदेव त्रिपाठी(सिंगापुर)राजबाला, आकांक्षा ,डा. अनुष्का, रोहन, मयंकराज, दिनेश माथुर, दीपिका डागर ,प्रकृति कुमारी, वंदना ,डॉ अनुराग सिंह, भोलाराम धाकड़ और चंद्रप्रकाश आदि.
कार्यक्रम का संचालन करते हुए आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के उदय मन्ना ने बताया कि यह संगोष्ठी आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत आयोजित की गई। उन्होंने भगवान धनवंतरी, महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत के ऐतिहासिक अवदान को नमन किया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती का स्मरण करते हुए मन्ना ने आगामी सामाजिक पहलों की जानकारी दी, जिसमें 25 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस, 26 सितंबर से पंद्रह दिवसीय पितृपक्ष संदेश,29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस और 30 सितंबर को भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ मिलकर आयोजित किया जाने वाला स्वैच्छिक रक्तदान शिविर और संकल्प भी शामिल है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के उदय मन्ना ने बताया कि यह संगोष्ठी आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत आयोजित की गई। उन्होंने भगवान धनवंतरी, महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत के ऐतिहासिक अवदान को नमन किया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती का स्मरण करते हुए मन्ना ने आगामी सामाजिक पहलों की जानकारी दी, जिसमें 25 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस, 26 सितंबर से पंद्रह दिवसीय पितृपक्ष संदेश,29 सितंबर को विश्व हृदय दिवस और 30 सितंबर को भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ मिलकर आयोजित किया जाने वाला स्वैच्छिक रक्तदान शिविर और संकल्प भी शामिल है।
आकांक्षा
हेड क्रिएटिव टीम
आरजेएस पीबीएच
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